court 1 20

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला पलटा, जैन समाज पर हिन्दू विवाह अधिनियम होगा लागू

फैमिली कोर्ट ने एक साथ खारिज किए थे 28 परिवाद, हिंदू मैरिज एक्ट में अल्पसंख्यक वर्ग के पक्षकारों को सुनवाई का हक नहीं होने के आधार पर…

इंदौर। मध्यप्रदेश की इंदौर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने आज जैन समाज के तलाक के केसों में एक बड़ा आदेश दिया है. आदेश के तहत हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया है जिसमें हिंदू मैरिज एक्ट में अल्पसंख्यक वर्ग के पक्षकारों को सुनवाई का हक नहीं होने के मुद्दे पर एक नहीं बल्कि 28 परिवाद एक साथ खारिज कर दिए थे.

इनमें ऐसे भी मामले थे जिनमें दंपत्ति ने आपसी सहमति से अलग होने के लिए अर्जी दायर की थी. अब हाई कोर्ट के आदेश के बाद जैनियों के ये 28 केस हिन्दू विधि के तहत फिर से फैमिली कोर्ट रेफर होंगे. पिछले दिनों जैन समाज की दंपती ने आपसी सहमति के आधार पर फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी लगाई थी. इसमें तर्क दिया था कि दोनों पक्ष जैन हैं, वे तलाक देना चाहते हैं. याचिका पर कोर्ट ने कहा कि इनकी हिन्दुओं से धर्म प्रथा व मान्यता अलग है.

दूसरा 2014 में इनका अल्पसंख्यक कैटेगरी में नोटिफिकेशन हो चुका है. ऐसे में अल्पसंख्यक होने से इन्हें हिन्दू विवाह अधिनियम का लाभ नहीं दिया जा सकता. कोर्ट ने इसके सहित सभी 28 परिवाद खारिज कर दिए थे. अधिवक्ता पंकज खंडेलवाल ने बताया कि इसके खिलाफ हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच की शरण ली गई थी. इसमें कोर्ट ने माना कि जब संविधान का आर्टिकल 25 में जिक्र है कि हिन्दुओं में जैन भी आते हैं. वे भी हिन्दू हैं इसलिए उन पर हिन्दू विवाह अधिनियम भी लागू होगा. फैमिली कोर्ट को यदि परेशानी थी कि उसे केसोंं हाईकोर्ट रेफर करना था न कि खारिज. कोर्ट ने माना कि जैनियों की जितनी हिन्दू विधियां हैं, उन पर लागू होती हैं. इसके साथ ही ये केस फैमिली कोर्ट रेफर कर दिए.IMG 20250216 WA0349

यह भी कहा न्यायालय ने

उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि हिंदू विवाह वैधता अधिनियम, 1949 को हिंदुओं, सिखों और जैनों तथा उनकी विभिन्न जातियों, उपजातियों और संप्रदायों के बीच सभी मौजूदा विवाहों को वैध बनाने के लिए पारित किया गया था.

अधिनियम की धारा 2 में हिंदू की परिभाषा के अनुसार सिख या जैन धर्म को मानने वाले व्यक्ति शामिल हैं.

उक्त अधिनियम की धारा 3 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सिख और जैन सहित हिंदुओं के बीच कोई भी विवाह किसी अन्य मौजूदा कानून, व्याख्या, पाठ, नियम, रीति-रिवाज या उपयोग के आधार पर अमान्य नहीं माना जाएगा.

यह कहा था फैमिली कोर्ट ने

वे हिंदू धर्म की मूलभूत वैदिक मान्यताओं को अस्वीकार करने वाले हैं और स्वयं को बहुसंख्यक हिंदू समुदाय से अलग कर चुके हैं.

उनसे जुड़े वैवाहिक मामलों का निराकरण हिंदू विवाह अधिनियम के तहत नहीं किया जा सकता.

कुटुंब न्यायालय के निर्णय पर यहां रखा जैन समाज ने पक्ष

कुटुंब न्यायालय के निर्णय को चुनौती देते हुए नीतेश सेठी ने अभिभाषक पंकज खंडेलवाल के माध्यम से उच्च न्यायालय में अपील की थी.

अभिभाषक खंडेलवाल ने उच्च न्यायालय में तर्क रखा कि संविधान में हिंदू की परिभाषा में जैन भी शामिल हैं.

हिंदू उत्तराधिकारी अधिनियम में भी हिंदू की परिभाषा में जैन धर्मावलंबियों को शामिल किया गया है.

अल्पसंख्यकों में बुद्ध, जैन, सिख शामिल हैं और इन सभी के वैवाहिक विवाद हिंदू विवाह अधिनियम के तहत निराकृत होते रहे हैं.

खंडेलवाल ने हिंदू विवाह विधि मान्य अधिनियम 1949 का हवाला देते हुए कहा कि इसमें दी गई हिंदू की परिभाषा में पहले से ही जैन शामिल हैं.

सभी पक्षकारों को सुनने के बाद न्यायालय ने निर्णय सुरक्षित रख लिया था, जो सोमवार को जारी हुआ.

उच्च न्यायालय की युगलपीठ ने कुटुंब न्यायालय के निर्णय को निरस्त करते हुए कुटुंब न्यायालय को आदेश दिया है कि वह मामले में हिंदू विवाह अधिनियम के प्रविधानों के तहत आगे सुनवाई करे.

28 याचिकाएं की गई थीं निरस्त कुटुंब न्यायालय ने वैवाहिक विवादों से संबद्ध जैन समुदाय की 28 याचिकाएं निरस्त कर दी थीं.

अभिभाषक खंडेलवाल ने बताया कि इनमें से चार मामलों में उच्च न्यायालय में अपील हुई थी। इनमें अभिभाषक वर्षा गुप्ता, अभिभाषक यशपाल राठौर भी पैरवी कर रहे थे.

कुटुंब न्यायालय के अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश द्वारा जैन समुदाय के वैवाहिक मामलों की सुनवाई हिंदू विवाह अधिनियम के तहत सुनने से इन्कार करने के बाद कुटुंब न्यायालय की अन्य खंडपीठों ने भी जैन समुदाय के मामलों की सुनवाई रोक दी थी.

कुटुंब न्यायालय पर की तल्ख टिप्पणी12 पृष्ठों के निर्णय में उच्च न्यायालय ने कुटुंब न्यायालय पर तल्ख टिप्पणी भी की है.

न्यायालय ने निर्णय में कहा वर्तमान समाज धर्म, जाति, संप्रदाय, मूल और भाषा के आधार पर विखंडित है.

कुटुंब न्यायालय ने हिंदू धर्म के अनुयायियों और जैन समुदाय की धार्मिक प्रथाओं के बीच अंतर का पता लगाने का प्रयास किया.

हालांकि प्रथाओं से पता चलता है कि दोनों समुदायों के अनुयायियों द्वारा किए जाने वाले विवाह अनुष्ठान आमतौर पर समान हैं.

कुटुंब न्यायालय को जैन समुदाय के अनुष्ठानों और प्रथाओं की विद्वत्तापूर्ण व्याख्या करने के बजाय विचाराधीन मामले में स्पष्ट कानूनी प्रविधानों को लागू करना था.

Scroll to Top