हरदा (सार्थक जैन)। कृषि बाहुल्य हरदा जिले में बैलगाड़ी दौड़ हमेशा होती रहती है यहां काफी संख्या में बैलगाड़ी दौड़ के प्रेमी है। इतिहास के पन्नों से एक रोचक और गौरवपूर्ण घटना सामने आई है, जो ग्रामीण जीवन और पारंपरिक साधनों की अहमियत को उजागर करती है। वर्ष 1925 में, जब भारत अंग्रेजों के शासन के अधीन था, उस समय हरदा तहसील के ग्राम कड़ोला में बैलगाड़ी से जुड़े एक विशेष कार्य के लिए अंग्रेजी प्रशासन ने ₹100 का इनाम घोषित किया था।
ग्राम कड़ोला निवासी कैलाश विश्वकर्मा से प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह इनाम बैलगाड़ियों के कार्य की जांच और उनकी उपयोगिता को परखने के उद्देश्य से रखा गया था। उस दौर में बैलगाड़ी ग्रामीण परिवहन और खेती-किसानी का प्रमुख साधन हुआ करती थी। खेतों से अनाज ढोने से लेकर व्यापारिक गतिविधियों तक, बैलगाड़ी का विशेष महत्व था।
इस ऐतिहासिक घोषणा में यह भी उल्लेख मिलता है कि कार्य में कुशलता और समयबद्धता दिखाने वाले व्यक्तियों को सम्मानित किया जाएगा। ₹100 की राशि उस समय बहुत बड़ी मानी जाती थी, जिससे इस प्रतियोगिता या जांच का महत्व और भी बढ़ जाता है।
ग्राम कड़ोला की यह घटना न केवल उस समय की प्रशासनिक व्यवस्था को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि किस प्रकार पारंपरिक साधनों को भी गंभीरता से लिया जाता था। आज जब आधुनिक परिवहन साधनों का बोलबाला है, तब यह कहानी हमें अपनी जड़ों और ग्रामीण नवाचारों की याद दिलाती है।
स्थानीय इतिहासकारों का मानना है कि इस तरह की घटनाएं ग्रामीण भारत की समृद्ध परंपरा और आत्मनिर्भरता का प्रमाण हैं। यह प्रसंग आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत भी है।












