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पेड़ से टपकते महुंऐ की खुशबू से महका वनांचल : महुए की यह महक न केवल मन को मदहोश कर रही है, बल्कि आदिवासियों के जीवन में आर्थिक समृद्धि की नई उम्मीद भी लेकर आई

फाल्गुन मास की विदाई और चैत्र मास की दस्तक देने के साथ ही जिले के सुदूर वनांचल इन दिनों महुए की भीनी-भीनी खुशबू से सराबोर हैं। प्राकृतिक वातावरण में घुली महुए की यह महक न केवल मन को मदहोश कर रही है,बल्कि आदिवासियों के जीवन में आर्थिक समृद्धि की नई उम्मीद भी लेकर आई है।

*​वनांचल वासियों के लिए “कल्पवृक्ष” है महुआ*

​क्षेत्र के जनजातीय समाज के लिए महुआ का पेड़ किसी “कल्पवृक्ष” से कम नहीं है। यह उनके जीवन यापन और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। महुआ झड़ने(टपकने) से पहले ही ग्रामीण अपने-अपने पेड़ों की साफ-सफाई कर उन पर कपड़े का टुकड़ा बांधकर अपनी पहचान सुनिश्चित कर देते हैं। परंपरा के अनुसार, जिस पेड़ पर जो व्यक्ति चिन्ह बांधता है,महुआ बीनने का अधिकार भी उसी का होता है। इस वर्ष अनुकूल मौसम के चलते जिले के वन क्षेत्र में महुए की बंपर आवक देखी जा रही है।​

*भवानी प्रसाद मिश्र की पंक्तियां हुई जीवंत*

​जंगलों और महुए की इसी मादकता से प्रभावित होकर राष्ट्रकवि भवानी प्रसाद मिश्र ने कभी अपनी कलम से लिखा था..​”जब भी होली पास आती,सरसराती घास गाती,और महुए से लपकती मस्त करती बास आती..”​आज के मौसम और वनांचल क्षेत्र की स्थिति को देखकर कवि की ये पंक्तियां पूरी तरह सटीक बैठ रही हैं।हर तरफ बिखरे हल्के पीले सफेद रंगों के महुआ फूल और उनकी खुशबू राष्ट्रकवि की कल्पना को साकार कर रही है।

*​महुआ बीनने की होड़ में न जलाएं जंगल*

​जहाँ एक ओर महुए की आवक से खुशी है, वहीं दूसरी ओर वन संपदा पर खतरे के बादल भी मंडरा रहे हैं।अक्सर देखा जाता है कि महुआ बीनने के लिए ग्रामीण पेड़ के नीचे की सूखी घास साफ करने हेतु आग लगा देते हैं। हवा के झोंकों के साथ यह आग धीरे-धीरे पूरे जंगल में फैल जाती है, जिससे बेशकीमती वन संपदा और वन्यजीवों को भारी नुकसान पहुँचता है।

*​वन विभाग की अपील*

वन विभाग के अधिकारियों ने ग्रामीणों से विशेष अपील की है कि वे महुआ बिनने और इसे एकत्रित करने के लिए किसी भी स्थिति में आग का सहारा न लें। जंगल को सुरक्षित रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी बनती है।

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