जिले में इन दिनों गणगौर महोत्सव की रौनक देखते ही बन रही है। चैत्र माह में मनाया जाने वाला नौ दिवसीय यह पारंपरिक उत्सव पूरे हर्षोल्लास और श्रद्धा भाव के साथ मनाया जा रहा है। गांव-गांव और नगर में “झूलो बांध्यो झुली जाए गउर बाई, झुला देबे धनियर राजा देखत मन हर्षाय” जैसे पारंपरिक गीतों की मधुर ध्वनि वातावरण को भक्तिमय बना रही है।
महोत्सव के तहत क्षेत्र के कई ग्रामों में गणगौर पावनी बुलाई गई है। आयोजक परिवार पूरे विधि-विधान से माता गणगौर और धनिया राजा की पूजा-अर्चना कर रहे हैं। महोत्सव के प्रथम दिवस सुबह से ही पूजा-पाठ के साथ कार्यक्रमों की शुरुआत हो जाती है। दोपहर में महिलाएं पारंपरिक ‘पाती’ खेलती हैं, जबकि शाम के समय सामूहिक नृत्य का आयोजन होता है। रात्रि में बाहर से आई भजन मंडलियां अपनी आकर्षक प्रस्तुतियां देती हैं, जिन्हें देखने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण एवं नगरवासी उपस्थित होते हैं।
गणगौर महोत्सव का विशेष महत्व राजस्थान और निमाड़ क्षेत्र में अधिक माना जाता है, जहां से इस परंपरा की शुरुआत मानी जाती है। मान्यता के अनुसार, भगवान शंकर और माता पार्वती को ही गणगौर माता और धनिया राजा के रूप में पूजा जाता है। इस दौरान महिलाएं विशेष रूप से पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-समृद्धि और पति की दीर्घायु की कामना करती हैं।
कई स्थानों पर यह महोत्सव मनोकामना पूर्ण होने पर भी आयोजित किया जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि गणगौर माता से मांगी गई हर मन्नत अवश्य पूरी होती है। इसी आस्था के चलते लोग मन्नत पूर्ण होने पर इस उत्सव का आयोजन करते हैं और अंतिम दिन भंडारे का आयोजन भी किया जाता है।
शुक्रवार को गणगौर माता और धनिया राजा की नगर भ्रमण यात्रा निकाली गई, जो विभिन्न मार्गों से होते हुए राधा-कृष्ण मंदिर पहुंची। वहां श्रद्धालुओं ने विधिवत पूजा-अर्चना कर दर्शन लाभ लिया। इसके पश्चात स्थानीय घाट पर विसर्जन किया गया और नौ दिवसीय उत्सव का समापन हुआ













